Friday, September 11, 2020

Kautilya Arthashatra Presentation

 




















Copied Doc (कौटिल्य अर्थशास्त्र)

 


कौटिल्य और उनका अर्थशास्त्र

प्रेमकुमार मणि सवाल उठा रहे हैं कि चाणक्य और कौटिल्य क्या दो अलग-अलग इंसान थे या फिर दोनों में से कोई एक महज कल्पना है। उनके मुताबिक, ‘अर्थशास्त्र’ अपने सामाजिक-वैचारिक ढाँचे में ‘एक और मनुस्मृति’ है। मनुस्मृति जिस ब्राह्मणवाद को सामाजिक ढाँचे में शामिल करना चाहती हैं, अर्थशास्त्र उसी को राजनैतिक ढाँचे में शामिल करने की कोशिश करती है

जन-विकल्प

चन्द्रगुप्त मौर्य के मंत्री के रूप में चाणक्य के होने की बात कही जाती है, जिसे किन्ही चणक का पुत्र बताया गया है। कुछ लोग इसे मगध और कुछ अन्य तक्षशिला का निवासी बताते हैं। इसी चाणक्य को विष्णुगुप्त और कौटिल्य के रूप में भी चिह्नित किया गया है। चाणक्य के रूप में यह चाणक्य नीति-दर्पण का रचयिता भी है और इसी रूप में संस्कृत साहित्य के इतिहास में इसे रेखांकित किया गया है। लेकिन चाणक्य को वहां ‘अर्थशास्त्र ‘ का रचयिता नहीं बताया गया है। 


हालांकि ‘अर्थशास्त्र’ के पन्द्रहवें अधिकरण में ‘स्वयमेव विष्णुगुप्तश्चकार सूत्रंच भाष्यं च’ (अर्थशास्त्र 15/180/1) आया है, जो यह स्पष्ट करता है कि विष्णुगुप्त ने इन सूत्रों और इनके भाष्य की रचना की है। यदि कौटिल्य और विष्णुगुप्त एक हैं भी तो क्या चाणक्य भी इसी व्यक्ति का नाम है? और क्या यही व्यक्ति चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन काल में मंत्री रहा है? पेंचोखम इतने हैं कि क्या सत्य है और क्या असत्य यह तय कर पाना आसान नहीं रह जाता। मुश्किलें गहरा जाती हैं, जब हम यह जानते हैं कि चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में रहे यूनानी राजदूत मेगास्थनीज ने अपनी किताब ‘इंडिका’ में कहीं भी चाणक्य, कौटिल्य, या विष्णुगुप्त का जिक्र नहीं किया है, जबकि अनेक छोटी-छोटी बातों, यहां तक कि मोर-कबूतर तक की चर्चा वहां है। इसी प्रकार पुष्यमित्र शुंग के गुरु पतंजलि द्वारा पाणिनि के ‘अष्टाध्यायी’ पर लिखे गए ‘महाभाष्य’ में मौर्यों और चन्द्रगुप्त की सभा का उल्लेख है, लेकिन कौटिल्य की चर्चा नहीं है। 

मैसूर ओरिएण्टल गवर्नमेंट लाइब्रेरी के लाइब्रेरियन रुद्रपत्तन साम शास्त्री को एक पांडुलिपि वर्ष 1905 में मिली। यह पांडुलिपि संस्कृत में थी। इसे ही कौटिल्य के अर्थशास्त्र के रूप में प्रकाशित किया गया। इसकी शुरूआत में शुक्र और वृहस्पति की स्तुति की गयी है

बहुत बाद के एक संस्कृत नाटककार विशाखदत्त, जिनका समय ठीक-ठीक तय नहीं है। लेकिन उन्हें ईसा की चौथी सदी के पहले तो नहीं ही माना जाता, (यह अलग बात है कि उन्हें सातवीं सदी तक लोग खींच लाते हैं), के नाटक ‘मुद्राराक्षस ‘ में चाणक्य एक खास भूमिका में तो है, लेकिन ध्यातव्य है कि इसमें भी वह चन्द्रगुप्त का मंत्री नहीं है, बल्कि नाटक का विषय ही है कि चाणक्य नन्द वंश के अन्तिम राजा धननंद के मंत्री राक्षस को चन्द्रगुप्त का मंत्री बनाना चाहता है ,क्योंकि वह बहुत योग्य है। इस कार्य में वह सफल नहीं होता और इसके लिए वह एक कूटनीति रचता है। राक्षस अपने परिवार को अपने मित्र सेठ चंदनदास के यहां रख कर बाहर चला गया है। राक्षस के दो और प्रिय पात्र शकटदास और जीवसिद्धि हैं। चाणक्य को राक्षस का एक मोहर (मुद्रा) मिल जाता है, जिसके सहारे शकटदास से एक पत्र लिखवा कर वह व्यूह रचना करता है। नाटक के आखिर में एक नाटकीय घटनाक्रम में चंदनदास को फांसी की सजा होती है और उसे वधस्थल पर लाया जाता है। इसी समय पाटलिपुत्र लौटा हुआ राक्षस प्रकट होकर चाणक्य से मिलता है और उसका प्रस्ताव मंजूर कर लेता है। यानि चन्द्रगुप्त मौर्य का मंत्री होना स्वीकार लेता है। यदि विशाखदत्त के इस नाटक के आधार पर ही हम चाणक्य को एक ऐतिहासिक व्यक्ति मानते हैं,तब उनसे यह भी सिद्ध होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य का मंत्री राक्षस था, न कि चाणक्य। ऊपर मैंने मेगास्थनीज या पतंजलि के बारे में जो यह बतलाया कि उन्होंने किसी चाणक्य, कौटिल्य अथवा विष्णुगुप्त का जिक्र नहीं किया है, और इस आधार पर चाणक्य की स्थिति संदिग्ध है, के प्रश्न मैंने नहीं, जाने-माने इतिहासकारों ने उठाये हैं। मेगास्थनीज ने किसी अन्य मंत्री का नाम भी नहीं लिया है, और ऐसा भी नहीं कि मौर्य साम्राज्य में कोई मंत्री न हो। मंत्री तो कोई होगा ही। संभव है मेगास्थनीज या पतंजलि के जमाने तक उसकी भूमिका को लोगों ने महत्वपूर्ण नहीं माना हो। लेकिन आधुनिक ज़माने में अभिजन इतिहासकारों को एक ऐसे मंत्री की जरुरत थी, जो मौर्य काल और चन्द्रगुप्त पर हावी हो। संभव है चाणक्य से चन्द्रगुप्त का मित्र या गुरु के रूप में कोई संबंध हो और पश्चिमोत्तर पंजाब के इलाकों में पैर जमाने व नन्द साम्राज्य को सत्ता से उखाड़ फेंकने में चन्द्रगुप्त ने चाणक्य से कुछ सहायता ली हो। यह भी संभव है कि योग्य मंत्री के चुनाव होने तक, जैसा कि विशाखदत्त के नाटक ‘मुद्राराक्षस’ से प्रतिध्वनित होता है, चाणक्य मंत्री रहा हो। लेकिन यह चाणक्य ‘अर्थशास्त्र’ के कौटिल्य की तरह कुटिल चरित्र का नहीं हो सकता। संभव है चाणक्य की राजनीति और प्रशासनिक सुधार संबंधी कुछ बातों को किसी ने ‘अर्थशास्त्र’ का हिस्सा बना दिया हो, जैसा कि ट्राउटमैन कहते हैं ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र के कुछ अंशों के मूल रचयिता हो भी सकते हैं, किन्तु सम्पूर्ण अर्थशास्त्र के सृजनकर्ता के रूप में उनको स्वीकार नहीं किया जा सकता।’ अर्थशास्त्र के एक अन्य विदेशी भाष्यकार कांग्ले का कहना है ‘कौटिल्य ने इसे नन्द शासक द्वारा अपमानित होने और चन्द्रगुप्त के सत्ता में आने की अवधि के बीच में लिखा।’ यह संभव है कि धननंद से अपमानित चाणक्य क्षुब्ध हो और इस अवधि में उसने अनाप-शनाप लिख दिया हो। लेकिन कांग्ले ने इस बात पर विचार नहीं किया कि किसी चाणक्य को इस हाल में ग्रन्थ और श्लोक रचने की फुर्सत क्या होगी? वह उन संभावनाओं की तलाश में होगा, जिससे नन्द-साम्राज्य का खात्मा हो। यह संभावना उसे चन्द्रगुप्त में दिखी और उसने उसका साथ दिया। 


एक और बिंदु विचारणीय है। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार चन्द्रगुप्त न ब्राह्मण था, न अभिजात। उसका शूद्र या अधिक से अधिक वैश्य होना संभव है, जैसाकि उसके नाम के साथ गुप्त का जुड़ा होना वैश्य का सूचक बताया गया है। लेकिन इस आधार पर तो विष्णुगुप्त भी वैश्य होगा, क्योंकि उसके नाम में भी गुप्त है। और ऐसे में यह कौटिल्य निश्चय ही कोई अन्य प्रतीत होता है। 

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कौटिल्य संस्कृत शब्द है और यह किसी जाति-प्रजाति या देवी-देवता का नहीं, बल्कि एक प्रवृत्ति का परिचायक है। संस्कृत शब्दकोश के अनुसार इस शब्द की उत्पत्ति कुटिल से है, जिससे इसका अर्थ बनता है कुटिलपन, दुष्टता या जालसाज। चाणक्य नाम से तो चाणक्य-नीति सार अथवा दर्पण से लोग परिचित थे, लेकिन कौटिल्य नाम से लोग कोई सवा सौ साल पहले तक पूरी तरह अनभिज्ञ थे। यह 1905 की बात है जब मैसूर ओरिएण्टल गवर्नमेंट लाइब्रेरी के लाइब्रेरियन रुद्रपत्तन साम शास्त्री को एक पांडुलिपि हाथ लगी, जो उन्हें एक अनजाने से पंडित ने उपलब्ध कराया था। यह 168 पृष्ठों की संस्कृत पांडुलिपि थी, जिसके साथ भद्रस्वामी नामक एक टीकाकार की व्याख्या भी थी। इस ग्रन्थ में पंद्रह अधिकरण, 180 प्रकरण, 150 अध्याय और 380 कारिकाएँ हैं। कुल मिला कर लगभग 6000 श्लोकों का यह ग्रन्थ है। पांडुलिपि के आरम्भ में ॐ अंकित था और वृहस्पति व शुक्र, जो क्रमशः देवों और दानवों के गुरु हैं, की स्तुति थी। इसके बाद लिखा था अर्थशास्त्र पूर्व के आचार्यों की उत्कृष्ट रचनाओं का संकलन है, जिसके द्वारा सम्पूर्ण विश्व को अर्जित कर उसकी रक्षा की जा सकती है। .इसके बाद अध्ययन किए गए विषयों को सूचीबद्ध किया गया है। प्राक्कथन में ही यह लिखा गया है कि सरलता से ग्राह्य इस आख्यान के संकलनकर्त्ता कौटिल्य हैं। लाइब्रेरियन साम शास्त्री जिज्ञासु और सुरुचिसंपन्न व्यक्ति थे। उनने इस पाण्डुलिपि का परिश्रमपूर्वक संपादन और अंग्रेजी अनुवाद किया। उनका यह काम 1909 ई में पूरा हुआ और यह इंडियन एंटीक्वेरी शोधपत्रिका में प्रकाशित हुआ। 1915 में यह अनुवाद स्वतंत्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ। मैंने जिस संस्करण को देखा है, वह 612 पृष्ठों की है और इसे बंगलोर गवर्नमेंट प्रेस ने प्रकाशित किया है। इसके पंद्रह अधिकरणों पर हमें विहंगम ही सही, एक नज़र अवश्य डालनी चाहिए। जैसा कि बता चुका हूँ प्रथम अधिकरण में उन विषय -बिंदुओं की चर्चा है, जिन पर इस पुस्तक में विचार किया गया है। दूसरे में आंतरिक प्रशासन और सरकारी अधीक्षकों के कर्तव्यों का ब्यौरा है। तीसरा विधि एवं न्याय से सम्बद्ध विषयों पर विचार कर्त्ता है। चौथा दंडनीति और पांचवां गुप्तचर सेवाओं और दरबारियों के व्यवहार के नियम-कायदों पर केंद्रित है। छठा राज्य के शक्तिस्रोत पर, सातवां बहुस्तरीय नीतियों, जिसमें विदेश और अंतर्देशीय संबंध हैं, आठवां आपदाओं, नौवां आक्रमण, दसवां युद्ध, ग्यारहवां निगमों की नियमावली, बारहवां शत्रुबल, तेरहवां अधिकृत किये गए संसाधनों और किलाओं, चौदहवां गुप्त खजानों और पन्द्रहवां संधि -योजनाओं से संबंधित है। तमाम विषय इतने सवालों को छूते हैं कि आश्चर्य होता है किसी एक व्यक्ति ने ,इतने पुराने समय में इन बातों पर विचार किया होगा। ऐसे में ‘अर्थशास्त्र’ की पांडुलिपि में उल्लिखित इस बात में दम है कि इसके संकलनकर्ता कोई कौटिल्य हैं। ऐसा प्रतीत होता है किसी व्यक्ति ने भारतीय ज्ञान परंपरा में विभिन्न राजनयिकों और विद्वानों द्वारा उल्लिखित तमाम विचारों को संकलित किया, जैसे मनु ने प्रचलित सामाजिक परिपाटियों और व्यवस्थाओं का किया या वेदव्यास ने वेदों का किया, या फिर चरक और वात्स्यायन ने अपने-अपने विषय के ज्ञान का किया। यह भी संभव है किसी चाणक्य या विष्णुगुप्त ने इसके कुछ अंशों का सम्पादन किया हो और कालांतर में इसमें चीजें जुड़ती चली गयी हों। व्यावहारिक राजकाज में प्रायः धर्म और नैतिकता की अवहेलना होती रहती है, शायद इसी कारण से पुराने ज़माने से ही राजनीति को लोग ख़राब दृष्टि से देखते हैं। इसी कारण संभव है किसी सम्पादनकर्ता ने इसका नाम कौटिल्य रख दिया हो।


जनसामान्य में प्रायः यह समझा जाता रहा है कि अर्थशास्त्र का संबंध धन-संपत्ति से है, जैसा कि यह शब्द हिंदी में अंग्रेजी के इकोनॉमिक्स के लिए रूढ़ हो गया है। लेकिन अर्थशास्त्र राजनीति शास्त्र की किताब है और यह शासक के लिए लिखा गया ग्रन्थ है, जिसमें राज्य, राजा, राज्य की विभिन्न संस्थाओं और उन संस्थाओं के क्रिया-कलापों, नियम-कायदों, कर्तव्यों और कतिपय सिद्धांतों को सूत्रबद्ध किया गया है। इस ग्रन्थ के अनुसार ये तमाम निदेश विजिगीषु यानी विजय के इच्छुक राजा के लिए है। इस पुस्तक के महत्व को देखते हुए इस पर देशी-विदेशी विद्वानों ने काम किया है और विभिन्न देशी-विदेशी जुबानों में आज इसके जाने कितने अनुवाद हैं। इन सारे अनुवादों और कार्यों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण आर. पी. कांग्ले का किया अंग्रेजी अनुवाद बेहतर माना गया है, जो 1960-63 में प्रकाशित हुआ था। कौटिल्य का समय 350-275 ईसापूर्व निर्धारित किया गया है। उस समय कोई विद्वान इतने विस्तार से प्रशासनिक विषयों के बारे में लिखता है तो यह ख़ास बात तो है ही। लेकिन गहरे उतरने पर कई प्रश्न भी खड़े होते हैं। इस पुस्तक के पहले पाणिनि ने भाषा विज्ञान पर ‘अष्टाध्यायी’ लिखा और इसके बाद पतंजलि ने उस पर अपना ‘महाभाष्य’ लिखा। दोनों के बीच में लिखे गए इस ‘अर्थशास्त्र’ में उस तरह का ज्ञानानुशासन नहीं दिखता। यह एक विचारणीय विषय होना चाहिए। 

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अपने चरित्र और ढाँचे में ‘अर्थशास्त्र’ इटालियन विद्वान मैकियावेली (Niccolo Machiavelli : 1469-1527) की विश्वप्रसिद्ध रचना ‘द प्रिंस’ की याद दिलाता है, जिसे व्यावहारिक राजनीति का बाइबिल कहा जाता है। ‘द प्रिंस’ के अंग्रेजी अनुवादक जार्ज बुल ने इसकी प्रस्तावना का आरंभ ही इन शब्दों में किया है – ‘सामान्यतया यह किताब प्रिंस शैतान द्वारा उत्प्रेरित कृति है।’ मैकियावेली ने सत्ता प्राप्ति के हर साधन को जायज ठहराने की कोशिश की है और राजनीति को धर्म-नैतिकता, दया-उदारता से विलग रहने की सलाह दी है। उसका कहना है राजा को हर हाल में आधा पशु होना ही चाहिए। इसके लिए उसने ग्रीक पौराणिकता के एक देवता चिरोन का उदाहरण दिया है, जिसका आधा शरीर जंगली पशु (बीस्ट) और आधा मनुष्य का होता है। संभवतः हिन्दू पौराणिकता में गणपति (आधा मनुष्य, आधा हाथी) की कल्पना भी ऐसी ही है। गणपति स्वयं धार्मिक से अधिक एक राजनैतिक शब्द है। 

निकोलो मैकियावेली की किताब ‘द प्रिंस’ के प्रारंभिक पृष्ठ

कौटिल्य के अर्थशास्त्र का सत्ता-सापेक्ष रुख मैकियावेली के ‘प्रिंस’ से कहीं गहरा और जनविमुख है। प्रथमदृष्टया प्रतीत होता है कि यह राज्य (स्टेट) को सर्वोपरि मानता है और तमाम चीजें, चाहे वे धर्म हों, या नैतिकता या कि प्रजा — केवल राज्य के लिए होने चाहिए। ऐसा राज्य आखिर क्यों होना चाहिए? और फिर राज्य किसके लिए होने चाहिए? लेकिन ‘अर्थशास्त्र’ को इसकी चिंता नहीं है। हर हाल में राज्य-हित, जिसका मतलब सिर्फ कर-संग्रह है, सर्वोपरि है। धर्म और नैतिकता का कोई औचित्य नहीं है। उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं, साधन चाहे जैसे हों। लेकिन राज्य के कुछ मौलिक प्रश्न, जो आज भी प्रासंगिक हैं, हमें इसके महत्व को रेखांकित करने के लिए विवश भी करते हैं। ‘अर्थशास्त्र’ प्रशासनिक ढाँचे को बहुत महत्व देता है और इसे गतिशील रखने के लिए राजा को तत्पर होने की सलाह देता है। अर्थशास्त्र ने राजा की दिनचर्या भी नियत की है। इसके अनुसार उसे अहले सुबह से देर रात तक पूरे राज-काज के निगरानी की सलाह दी है। प्रशासनिक अधिकारियों के महत्व को वह खूब समझता है और निगरानी रखने के लिए गुप्तचर सेवा को दुरुस्त करने की बात इसमें दर्ज है, जो व्यावहारिक है। वह चालीस प्रकार के उन तरीकों की चर्चा करता है जिसे राज्य के अधिकारी राजस्व अपहरण के लिए इस्तेमाल करते हैं। (अर्थ . 2/24/8) कौटिल्य को मालूम है कि प्रशासनिक अधिकारी रिश्वत-खोर और चोर हैं। संभवतः इसलिए ही उसने लिखा है – 

यथा ह्यनास्वादयितुं न शक्यं जिह्वातलस्थं मधु वा विषंवा 

अर्थस्तथा ह्यर्यचरेण राजः स्वल्पोप्यना स्वादयितुं न शक्यः . 

मत्स्या यथातः सलिल चरन्तो ज्ञातुं न शक्या सलिल पिबन्तः 

युक्तास्तथा कार्यविधौ नियुक्ताः ज्ञातुं न शक्या धन माददाना .

(अर्थ . 2/9/ 32-33)

(अर्थात जीभ पर यदि शहद या विष रख दिया जाय तो उसका स्वाद लिए बिना कोई नहीं रह सकता, इसी तरह राजस्व अधिकारी अर्थ (धन) का कुछ भी स्वाद न लें, यह असंभव है। पानी में तैरती मछली कितना पानी पी गयी और अधिकारी कितना राजस्व हज़म कर गया यह जानना मुश्किल है।) हालांकि ऐसे दिलचस्प उदाहरण इस ग्रन्थ में आपको अनेक मिलेंगे, लेकिन फिर वे प्रसंग भी अनेक मिलेंगे, जिससे आप खिन्न हो कर कह सकते हैं, यह तो बस एक और मनुस्मृति है। उदाहरण के लिए तीसरे अधिकरण की उस उक्ति को देख सकते हैं जिसमे वह कहता है – शूद्र जिस अंग से ब्राह्मण पर प्रहार करे, उस का वह अंग काट देना चाहिए। (‘शुद्रो येणाङ्गेन ब्राह्मणंभिहन्यात तदस्य छेदयेत’ अर्थशास्त्र 3/73/19) कौटिल्य का रचयिता अपने सामाजिक सोच में मनु से कहीं अधिक वर्णवादी और संकीर्णमना है। कदम-कदम पर वह राजा को सलाह देता है कि वह वर्णधर्म का कड़ाई से पालन करे। कौटिल्य का विजिगीषु राजा मनु का वैचारिक अवतार होना चाहिए। 

कतिपय विद्वानों की भी यही मान्यता है कि ‘अर्थशास्त्र ‘ में चंद्रगुप्त मौर्य के प्रशासनिक ढाँचे की जानकारी है और यह भी कि उसी के अनुरूप मौर्य प्रशासन चल रहा था। लेकिन सच्चाई तो यह है कि पूरे ‘अर्थशास्त्र’ में चन्द्रगुप्त मौर्य या मगध साम्राज्य की चर्चा भी नहीं है। जवाहरलाल नेहरू की प्रसिद्ध किताब ‘ग्लिम्सेस ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री’ में अठारहवीं चिट्ठी ही इस अर्थशास्त्र पर है, जिसका शीर्षक है ‘चन्द्रगुप्त मौर्य एंड द अर्थशास्त्र’। इस पत्रनुमा आलेख में नेहरू ने जो लिखा है, उससे ऐसा प्रतीत होता है चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रशासनिक ढाँचे और नगर व्यवस्था को कौटिल्य ने सूत्रबद्ध किया है, किन्तु ऐसा नहीं है। संभव है नेहरू ने ‘अर्थशास्त्र’ को मूल रूप से पढ़ा नहीं हो, केवल उड़ती जानकारी उन्हें हो, अन्यथा वह यह नहीं लिखते –‘ …वन रूल फॉर द सिटीज, रिकार्डेड बाई कौटिल्या …’ 

मैं पुनः एकबार कहूँगा ‘अर्थशास्त्र ‘ का चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन-व्यवस्था अथवा काल से कुछ भी लेना-देना नहीं है। यह भी नहीं कि अर्थशास्त्र के विजिगीषु (विजय के इच्छुक) राजा के लक्षण चन्द्रगुप्त मौर्य में मिलते हों ,ताकि अनुमान हो सके कि वह कौटिल्य के अनुसार शासन-प्रबंध कर रहा था अथवा उसका शासन-प्रबंध कौटिल्य देख रहा था। 

लेकिन इन सब बातों के अलावा ‘अर्थशास्त्र’ का मुख्य उद्देश्य क्या है? हमें चुपचाप इतिहासकार रामशरण शर्मा की निम्नोक्त टिप्पणी देखनी चाहिए – “कौटिल्य का वर्णित राज्य ब्राह्मण समाज व्यवस्था का रक्षक और समर्थक है तथा ब्राह्मण धर्माचरणों का अनुयायी है। ब्राह्मणवाद का जो रूप वैदिक धर्म में विकसित हुआ है, उसे ‘अर्थशास्त्र’ में वर्णित राज्य व्यवस्था का मूल आधार माना जा सकता है। धर्म क्या है और अधर्म क्या है, इस विषय में इस पुस्तक की मान्यताएं तीन वेदों पर आधारित हैं। कौटिल्य राजा को निदेश देता है कि वह लोगों को कभी भी धर्म से विमुख नहीं होने दे। कारण, यदि मानव समाज आर्योचित आचरण करेगा, वर्णाश्रम धर्म पर आधारित रहेगा और तीनो वेदों की शिक्षा के अनुसार चलेगा तो वह समृद्ध रहेगा और कभी भी उसका नाश नहीं होगा।” डॉ. शर्मा आगे लिखते हैं – “ब्राह्मणों के प्रति कौटिल्य के रुख पर सावधानी से विचार करने की आवश्यकता है। वे प्रचलित समाज-व्यवस्था के वैचारिक संरक्षक थे और उनका मुख्य सम्बन्ध धार्मिक कार्यों से था। उत्तर वैदिक ग्रंथों में ब्राह्मण को तीन विशेषाधिकार प्राप्त थे — उन्हें शारीरिक पीड़ा नहीं दी जा सकती थी, वे सम्मान पाने के अधिकारी थे और वे दान पाने के पात्र थे। कौटिल्य ने इन सबको मान्यता दी हैं। उनके अनुसार ब्राह्मण अपीडनीय है। ‘अर्थशास्त्र’ में सब से अधिक सम्मान का अधिकार ब्राह्मणों को ही प्रदान किया गया हैं। इसमें कहा गया है कि मानवों में उन्हें वही स्थान प्राप्त हैं,जो स्वर्ग में देवताओं को हैं …. कौटिल्य केवल ब्राह्मणों का पक्ष ही नहीं लेता, बल्कि ब्राह्मणवादी जीवन पद्धति के खिलाफ पड़ने वाले सम्रदायों का विरोध करता हैं …कौटिल्य का विधान है कि यदि पाशुपत और शाक्य भिक्षु आदि परमार्थ संस्थाओं (धर्मशाला आदि) में टिकने आएं, तो इसकी सूचना गोप या स्थानिक नामक स्थानीय अधिकारीयों को दी जानी चाहिए।” 

उपरोक्त बातें वर्ग-हित की बात हो सकती है। हर शासन का कोई न कोई वर्ग जनाधार होता है। ऐसा लगता है बौद्ध धर्म से प्रभावित हर्यक वंश के राजाओं ने वैदिक धर्म और ब्राह्मणों की दीर्घकाल तक उपेक्षा की हो और उनके बाद महापद्मनंद और उसके बेटे धननन्द का क्षत्रान्तक शूद्र-राज आया वह कहीं अधिक द्विज-विरोधी रहा होगा। इससे क्षुब्ध कौटिल्य यदि राजा को एक नए वर्ग आधार ढूंढने की सिफारिश करता, तो बात का औचित्य समझ में आ सकता था। लेकिन वह तो राजा को अंधविश्वासों को सुनियोजित ढंग से फ़ैलाने और जनता से धन ऐंठने की सलाह देता है तो नीतिकार का कुटिल और शैतानी चरित्र सामने आता है – ‘कौटिल्य सुझाव देते हैं कि कि लोगों को अनेक सिरों वाला साँप दिखला कर उनसे धन इकठ्ठा किया जाय। अथवा किसी नाग को औषधि खिला कर बेहोश कर दिया जाय और भोले-भाले लोगों को उसे देखने के लिए बुला कर उनसे दर्शन-शुल्क वसूल किया जाय, शंकालु लोगों को विषैला पेय पिला कर या उन पर विषाक्त जल छिड़क कर उन्हें बेहोश कर दिया जाय और तब गुप्तचर घोषित करे कि देवता के कोप से वे संज्ञाशून्य हैं . इसी तरह गुप्तचर देवनिंदकों को साँप से डसवाकर इसे देव-कोप बताये।’ (प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार और संस्थाए : रामशरण शर्म ,पृष्ठ 258 )

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इस तरह के अंधविश्वासों की सूची इतनी लम्बी है कि उसे देखकर हैरानी होती है कि यह कौटिल्य नीतिकार है या अपराधी। दामोदर धर्मानंद कोसंबी ने अपनी किताब ‘प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता’ में ‘अर्थशास्त्र’ पर विस्तृत टिप्पणी की है। कोसंबी ‘अर्थशास्त्र’ का जितना पृष्ठपोषण कर सकते थे उन्होंने किया है, लेकिन उन अंशों को वह कैसे छोड़ सकते थे, जिसमें कौटिल्य राजा को अजीबो-गरीब सलाह देता है। उसकी सलाह है कि राजा स्वतंत्र कबीलों और छोटे-छोटे गणतंत्रों को सख्ती के साथ निरंकुश राजतन्त्र का हिस्सा बना ले। वह विस्तार से इसकी विधि भी बताता है। उन गणतंत्रों में फूट डालने और नफरत व अव्यवस्था फ़ैलाने की पूरी योजना बारीकी के साथ रखता है। मुख्य विधि यह थी कि “विघटन के लिए इन्हें भीतर से ही खोखला बनाया जाय। इन कबीलाई लोगों को ऐसे वर्ग-समाज के सदस्यों में बदला जाय जो व्यक्तिगत निजी संपत्ति पर आधारित हैं। इसके लिए तरीके बताये गए कि कबीलों के नेताओं को और सबसे सक्रिय लोगों को नगद घूस देकर, कड़ी-से-कड़ी शराब पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराके, अथवा उनकी व्यक्तिगत धनलिप्सा को बढ़ावा दे कर भ्रष्ट किया जाए। उनमें फूट डालने में भेड़िए, गुप्तचर, ब्राह्मण, ज्योतिषी, उच्च जाति की स्त्रियां, नर्तक, अभिनेता,गायक और वेश्याओं का उपयोग किया जाय। कबीले के वरिष्ठ सदस्यों को प्रोत्साहित किया जाए कि वे कबीले के भोज में निम्न हैसियत के सदस्यों के साथ बैठ कर भोजन न करें अथवा उनके साथ विवाह-संबंध नहीं स्थापित करें, दूसरी ओर, निम्न हैसियत के सदस्यों को सहभोज में भाग लेने और विवाह संबंध स्थापित करने के लिए उकसाया जाए। कबीले के भीतर की स्वीकृत पद-मर्यादा को हर प्रकार के आंतरिक उकसावे से तोड़ने की कोशिश होनी चाहिए। राज्य के प्रतिनिधि उन युवकों को, जिन्हे कबीले की प्रथा के अनुसार भूमि आमदनी में कम हिस्सा मिलता था, सही बंटवारे की मांग करने के लिए उकसा सकते हैं। घात लगा कर या विष देकर कबीले के किन्ही सदस्यों की हत्या– जिस के लिए कबीले के भीतर के ज्ञात प्रतिद्वंदियों को आरोपी ठहराया जाएगा — से और शत्रु द्वारा मुखिया को घूस दिए जाने की अफवाहें फ़ैलाने से सामाजिक कलह को बढ़ावा मिल सकता है। तब अर्थशास्त्र सम्मत राज्य का शासक सशस्त्र सेना के साथ प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करेगा। फिर कबीले के टुकड़े करके, कबीले के पांच से लेकर दस परिवारों तक के जत्थों को दूर-दूर के क्षेत्रों में बसाया जाए– ताकि वे इतनी दूर-दूर रहें कि लड़ाई के मैदान में एकत्रित होकर अपनी रणकुशलता नहीं दिखा सकें।” (पृष्ठ 182-83 ) 

उपरोक्त बातें अर्थशास्त्र के ग्यारहवें अधिकरण में दर्ज हैं। मैंने कोसंबी के हवाले से इसलिए उद्धृत किया हैं, जिससे इसकी विश्वसनीयता बढ़ सके। सामशास्त्री के अनुवाद से गुजरते समय मुझे कई बार अविश्वास हो रहा था कि ऐसी बातों के होते हुए आधुनिक भारत में यह चाणक्य-कौटिल्य भारतीय बुद्धिजीवी तबके का नायक कैसे बन गया? 

‘अर्थशास्त्र’ अपने सामाजिक-वैचारिक ढाँचे में ‘एक और मनुस्मृति’ हैं। मनुस्मृति जिस ब्राह्मणवाद को सामाजिक ढाँचे में शामिल करना चाहती है, अर्थशास्त्र उसी को राजनैतिक ढाँचे में शामिल करने की कोशिश करती है। यदि यह ‘अर्थशास्त्र’, मनुस्मृति से पहले की रचना हैं, तो कहा जा सकता हैं कि मनुसंहिता की रचना में इसने मार्गदर्शक ग्रंथ की भूमिका निभाई होगी। लेकिन यह शायद सच नहीं हैं। मुझे यही प्रतीत होता हैं कि अर्थशास्त्र पर ही मनुस्मृति की छाया है। अर्थशास्त्र के सामाजिक सरोकार इतने संकीर्ण हैं कि इस बात पर यकीन करना मुश्किल हैं कि कौटिल्य चन्द्रगुप्त का मार्गदर्शक या मंत्री रहा होगा। चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन प्रबंध में अर्थशास्त्र की कोई छवि नहीं हैं, बल्कि वह नन्द काल से चले आ रहे शासन-प्रबंध का विकसित रूप प्रतीत होता हैं, जिसकी मेगास्थनीज ने अपनी किताब ‘इंडिका ‘ में चर्चा की हैं। यूँ भी इतिहास के जो प्रचलित आख्यान हैं उसके अनुसार चाणक्य धननन्द से रंज था, न कि उसकी शासन-व्यवस्था से। विशाखदत्त के नाटक ‘मुद्राराक्षस’ को मान लें, तो धननंद के मंत्री राक्षस से चाणक्य इतना प्रभावित हैं कि मगध और चन्द्रगुप्त के हित के लिए हर हाल में उसे ही मंत्री बनाने के लिए कटिबद्ध हैं और अंततः कूटनीति से इस अभियान में वह सफल हुआ है।

(संपादन : नवल)

Monday, September 7, 2020

Double Standards

 Double Standards

Whether a person cool introvert or
intractable extrovert,
Whether one absolutely adorable or extent abominable
One behaves freaky or excessively gentle,
Terrifying terroist or hearty❤️ peace lovers
Comeperative atributes are just adjectival
Just a perception,
Madiba (Mandela) a bad terrorist prior 90s,
1993' Nobe Peace ☮️ Prize same Madiba
Double standards!!
How come hateful person to Super Hero?
Again Interpretation here, for own benefits !!

Fantastic outcomes against the given assignment in job
Several rewards and awards
Became several individuals' Ideal !
Brilliant, exceptional figures!
Every one's liking paragon !!
Moment his homosexuality secrecy disclosed
Damn!! unfollowing began,
A heavy erosion in iconicity !
People Liking worn-out !!
Although no deescalation in performance,
Double standards !!
Again Interpretation here, for own benefits !!

There is no good or bad without people, There is only Perception !!